शुभेंदु अधिकारी की 6 साल लंबी राजनीतिक जंग अब रंग लाई
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक बदलाव की पटकथा पूरी हुई है। जिस नेता ने कभी ममता बनर्जी को सत्ता के शिखर तक पहुँचाने में कंधा दिया था, आज वही शुभेंदु अधिकारी राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में बागडोर संभाल रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 'महाबरगद' को चुनौती देने और उसे उखाड़ने का यह सफर शुभेंदु के लिए छह साल के कड़े संघर्ष और अटूट संकल्प का परिणाम है।
संघर्ष की नींव और वैचारिक मतभेद
शुभेंदु अधिकारी के विद्रोह की शुरुआत अक्टूबर 2020 में हुई, जब पार्टी के भीतर बढ़ते पारिवारिक वर्चस्व और अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद ने उन्हें असहज कर दिया। नंदीग्राम आंदोलन के स्तंभ रहे शुभेंदु ने इसे 'नेतृत्व का अहंकार' माना। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के आदर्शों का हवाला देते हुए 'मैं और मेरा' की राजनीति पर कड़ा प्रहार किया। धीरे-धीरे उनकी जनसभाओं से ममता बनर्जी की तस्वीरें ओझल होने लगीं, जो इस बात का संकेत था कि बंगाल की राजनीति में एक बड़ा तूफान आने वाला है।
TMC से विदाई और भाजपा का सारथी बनना
27 नवंबर 2020 को ममता कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद शुभेंदु ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। सौगत राय और प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकारों की सुलह की कोशिशें भी उनके इरादों को डिगा नहीं सकीं। 19 दिसंबर 2020 को अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा का दामन थामने वाले शुभेंदु पार्टी के लिए एक ऐसे सारथी साबित हुए, जिन्हें बंगाल की रग-रग का ज्ञान था। उन्होंने न केवल संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत किया, बल्कि ममता बनर्जी के 'अपराजेय' होने के भ्रम को भी सफलतापूर्वक चुनौती दी।
एक नए युग की शुरुआत
पिछले छह वर्षों की अथक मेहनत, सटीक रणनीति और जनता से सीधे जुड़ाव ने आज शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया है। यह जीत न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि बंगाल में वैचारिक स्पष्टता और जमीनी नेतृत्व की जीत मानी जा रही है। आज जब वे शपथ लेने जा रहे हैं, तो राज्य की जनता को उनके नेतृत्व में एक नई प्रशासनिक दिशा, बेहतर कानून-व्यवस्था और विकास के एक नए अध्याय की उम्मीद है।

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