बंगाल में विपक्षी राजनीति तेज, माकपा ने टीएमसी को घेरा
कोलकाता। भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को लेकर एक बड़ा दावा किया है। माकपा के राज्य महासचिव मोहम्मद सलीम ने कहा कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का जनाधार इस भीषण गर्मी में बर्फ की तरह तेजी से घट रहा है। वाम दल को पूरी उम्मीद है कि वह जल्द ही टीएमसी को पछाड़कर राज्य में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में आ जाएगा। सलीम ने जोर देकर कहा कि वामपंथी ताकतें राज्य में अपनी वैचारिक विरोधी भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के खिलाफ जमीनी स्तर पर मजबूती से संघर्ष कर रही हैं।
टीएमसी की नीतियों के कारण भाजपा को मिला मौका
माकपा नेतृत्व का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस ने पिछले डेढ़ दशक के अपने शासनकाल में पुलिस और बाहुबलियों का जमकर दुरुपयोग किया है। इस दमनकारी नीति की वजह से ही आरएसएस और भाजपा को राज्य के ग्रामीण इलाकों में अपने पैर पसारने का अनुकूल माहौल मिला। माकपा के अनुसार, टीएमसी और भाजपा दोनों ही दल धर्म के नाम पर राजनीति करके वामपंथ को मुख्यधारा से दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब राज्य की जनता विकल्प के तौर पर वाम मोर्चे की ओर देख रही है।
गरीब तबके और अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर संघर्ष की रणनीति
आगामी रणनीतियों को साझा करते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि वामपंथी दल और श्रमिक संगठन उन गरीब फेरीवालों के हक में आवाज उठा रहे हैं, जिन्हें भाजपा शासित क्षेत्रों या प्रशासनिक कार्रवाइयों के कारण बेदखल होना पड़ा है। उन्होंने भाजपा पर सीधे तौर पर गरीबों की आजीविका छीनने का आरोप लगाया। इसके साथ ही माकपा ने संकल्प जताया है कि वह राज्य की साझी संस्कृति, आपसी भाईचारे और अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर लगातार अपनी लड़ाई जारी रखेगी।
गिरते वोट बैंक के बीच खोई सियासी जमीन पाने की कवायद
यदि चुनावी इतिहास पर नजर डालें, तो साल 1977 से 2011 तक बंगाल की सत्ता संभालने वाले वाम मोर्चे को हाल के वर्षों में भारी चुनावी नुकसान उठाना पड़ा है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2011 में वाम दल का जो वोट शेयर 39 फीसदी (जिसमें माकपा का हिस्सा 30 फीसदी था) था, वह 2021 के विधानसभा चुनाव में घटकर बेहद कम रह गया था, जहां माकपा केवल 4.45 प्रतिशत वोट ही हासिल कर सकी थी। पिछले चुनावों में वाम दल ने आईएसएफ जैसे दलों के साथ गठबंधन किया था, जबकि कांग्रेस अकेले चुनावी मैदान में उतरी थी। इन विपरीत आंकड़ों के बावजूद, माकपा नेतृत्व पश्चिम बंगाल में अपनी खोई हुई राजनीतिक प्रासंगिकता को दोबारा हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है।

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